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ये अन्नदाता नहीं भूहन्ता हैं

ट्वीट जगत से साभार : मुनींद्र मिश्र जी कहते हैं: 'हरित क्रान्ति से हुई आत्मनिर्भरता से पहले लोग ज्वार बाजरा मक्का बड़े चाव से खाते थे और इनकी खेती में जल का उपयोग भी सीमित हुआ करता था।'  हमारी टिपण्णी :मिश्र जी यही पौष्टिक अनाज हुआ  करता था खाद्य रेशों पुष्टिकर तत्वों से भरपूर।  शिवकांत जी लंदन से लिखते हैं प्रत्युत्तर में  :सच बात तो यह है ,पंजाब ,हरियाणा ,और उत्तरप्रदेश के किसान कर दाता के पैसे से सस्ती हुई दरों पर पानी ,बिजली ,खाद लेकर मजदूरों का दुनिया की न्यूनतम मजदूरी पर शोषण करते हुए ऊंची MSP पर बेचने के लिए उन जमीनों पर धान ,गेंहू और गन्ना उगाते हैं जो मोटे स्वास्थ्यप्रद अनाजों के लिए बनी है। धान गेंहू और गन्ने से भूजल सूख गया है। नहरी जल ,रासायनिक खाद और कीटनाशकों से जल -जमीं खारे और विषाक्त हो गए हैं। गेंहू ,बासमती  ने मधुमेह और जिगर के रोगों की महामारी फैला दी है। ये अन्नदाता नहीं  भूहन्ता हैं।सब्सिडी का बढ़ावा न देकर यूरोप की तरह इनकी उपज पर रोक लगनी चाहिए।  मुनींद्र मिश्र :इस पर भारत में रोक कैसे लगे कोई चर्चा तक तो करता नहीं। धान और गे...

एक ग़ज़ल कुछ ऐसी हो ,डेमोक्रेसी जैसी हो , मेरा चाहे जो भी हो ,तेरी ऐसी तैसी हो। डेमोक्रेसी ऐसी हो

यादों के झरोखे से -३  सीवीएस फार्मेसी चौबीसों घंटा खुली रहती है। यहां दूध भी मिलता है वाइन भी  यानी दवा भी दारु भी । फोटोग्रेफ्स भी बनवाते हैं यहां लोग। कॉस्मेटिक्स से लेकर परिधान तक सब कुछ यहां उपलब्ध है। यूं इसके गिर्द एक बड़ा खुला -खुला कार पार्क भी है तमाम अमरीकी स्टोर्स की तरह।   बाज़औकात(कभी -कभार ) आपका ध्यान कहीं और होता है और कार पार्क करते वक्त किसी और की गाड़ी आप ठोक देते हैं।  उस दिन ऐसा ही वाक्या गुंजन के साथ हुआ अमूमन वह ये एसयूवी लेकर नहीं चलती है उसकी अपनी अलग उसी की तरह क्यूट गाड़ी है जिससे वह डाउनटाउन डेट्रॉइट जाती रही है कैंटन से बरसात हो या बर्फबारी यहां सड़क रूकती नहीं है।सब अपने अपने काम पे पहुँचते है।   किसी आकस्मिक दुर्घटना आगजनी के वक्त एक तरफ का ट्रेफिक खुद -ब -खुद रुक जाता एक लेन चलती रहती है, बाकायदा।  उस दिन गुंजन के साथ भी कुछ अलग सा हुआ कार पार्क खाली सा ही था फिर भी अपनी  एसयूवी उसने एक काली शांत खड़ी गाड़ी से भिड़ा दी।  एक पल को उसने सोचा भाग खड़ी होवूं ,दूजे पल फिर ध्यान ये आया हो  न...