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एक ग़ज़ल कुछ ऐसी हो ,डेमोक्रेसी जैसी हो , मेरा चाहे जो भी हो ,तेरी ऐसी तैसी हो। डेमोक्रेसी ऐसी हो

यादों के झरोखे से -३  सीवीएस फार्मेसी चौबीसों घंटा खुली रहती है। यहां दूध भी मिलता है वाइन भी  यानी दवा भी दारु भी । फोटोग्रेफ्स भी बनवाते हैं यहां लोग। कॉस्मेटिक्स से लेकर परिधान तक सब कुछ यहां उपलब्ध है। यूं इसके गिर्द एक बड़ा खुला -खुला कार पार्क भी है तमाम अमरीकी स्टोर्स की तरह।   बाज़औकात(कभी -कभार ) आपका ध्यान कहीं और होता है और कार पार्क करते वक्त किसी और की गाड़ी आप ठोक देते हैं।  उस दिन ऐसा ही वाक्या गुंजन के साथ हुआ अमूमन वह ये एसयूवी लेकर नहीं चलती है उसकी अपनी अलग उसी की तरह क्यूट गाड़ी है जिससे वह डाउनटाउन डेट्रॉइट जाती रही है कैंटन से बरसात हो या बर्फबारी यहां सड़क रूकती नहीं है।सब अपने अपने काम पे पहुँचते है।   किसी आकस्मिक दुर्घटना आगजनी के वक्त एक तरफ का ट्रेफिक खुद -ब -खुद रुक जाता एक लेन चलती रहती है, बाकायदा।  उस दिन गुंजन के साथ भी कुछ अलग सा हुआ कार पार्क खाली सा ही था फिर भी अपनी  एसयूवी उसने एक काली शांत खड़ी गाड़ी से भिड़ा दी।  एक पल को उसने सोचा भाग खड़ी होवूं ,दूजे पल फिर ध्यान ये आया हो  न...

ये जन -अहित याचिकाकर्ता सब जानते हैं ये क्या कर रहें हैं

ये जन -अहित याचिकाकर्ता  सब जानते हैं ये क्या कर रहें हैं   गत कई बरसों से केंद्र में सत्ता बदली के साथ हर चीज़ 'पेड ' चल पड़ी है शादी में मुंह खोलकर मांगे गए दहेज़ की तरह फिर चाहे वह पेड न्यूज़ हो या ट्वीट और अब जनहित याचिका।  तुलसीदास ने कहा था : परहित सरिस धर्म नहीं भाई , पर  पीड़ा सम नहिं अधमाई।  तमाम किस्म के परपीड़क इन दिनों खरपतवार से फल फूल रहें हैं देसी विदेशी पैसे पर वेषधारी  किसान टर्मॉइल से लेकर सेन्ट्रल विस्टा के खिलाफ गाहे बगाहे प्रकटित आक्रोश -जीवियों  से।  ताज़ा -तरीन मामला मैडम  आन्या  मल्होत्रा (पेशे से अनुवादक )एवं सोहैल हाशमी (वृत्त चित्र निर्माता )द्वारा प्रस्तुत जनहित याचिका से ताल्लुक रखता है जिस पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा इन्हें अच्छी फटकार लगाईं गई है एक बेहद महत्व के राष्ट्रीय मुद्दे पर जिसे मैं और आप सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के नाम से  जानते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे निर्देशित और फ़िज़ूल की  याचिका बतलाया है जुर्माना भी ठोका है दोनों पर एक लाख का।  बतलाते चलें वर्तमान संसद भवन पुराने जमुना पुल की तरह...

उल्लुओं की कुछ बात ही और है। इन्हें यहां बैठे भूमंडलीय घटनाओं का नज़ारा दिख जाता है। ये राजनीति के उल्लू हैं. पक्षी नहीं विपक्षी हैं। एक नहीं इनके तेरह सिर हैं इनकी गर्दनें ३६० डिग्री घूम सकतीं हैं। घूमती रहतीं हैं। इसीलिए नित नई ट्वीट नित नै अफवाह ये रच रहे हैं

  उलूक टाइम्स  सुना है हरियाणा कोरोना कालीन इतिहास लेखन की पहल कर रहा है इस एवज़ इतिहासकारों का भी चयन कर लिया गया है। इनमें से एक भी उलटी चाल लेफ्टीया इतिहासकार नहीं होगा ऐसी आशा की जा सकती है। ये नेहरुवीयन भारत नहीं है।  इधर इसके समानांतर उलूक टाइम्स के तहत  उलूकों का इतिहास भी खुद ब ख़ुद इतिहास के पन्नों पर उतरता  जा रहा है ताकि सनद रहे इस कोरोना काल में अफवाओं का बाज़ार कितना गर्म रहा है। कहीं ये अफवाह है ,के शमशान में लकड़ी नहीं बची इसीलिए मुर्दे गंगा की रेती में दबा दिए गए हैं । कहीं ये के भारत के पास कोविड वेक्सीन नहीं हैं। राज्यों को वेक्सीन नहीं दी गई हैं।  भाई साहब आपको बतलादें  -होती उल्लू के भी दो ही आँख हैं लेकिन ये चहरे के आगे फिक्स्ड सॉकिट स्थाई कोटरों में जड़ी होती हैं कनखियों से उल्लू नहीं देख सकता अलबत्ता अपने गर्दन २७० डिग्री घुमा सकता है। बैकअप आर्टरीज़ होतीं हैं उल्लू के पास। हम और आप ऐसा नहीं कर सकते सब कुछ चटक जाएगा इंटरनल ब्लीडिंग शुरू हो जाएगी ब्लड वेसिल्स फट जाएगी।  उल्लुओं की कुछ बात ही और है। इन्हें यहां बैठे भ...