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सामने दर्पण के, जब तुम आओगे , अपनी करनी पर ,बहुत पछताओगे

 मोमता दीदी कहिन:मेरी टूटी टांग उठाएगी लोकतंत्र का बोझा ,मेरे पैर  ठीक होने दो , फिर देखूँगी आपके पाँव बंगाल की जमीन पर ठीक से चलते हैं या नहीं:ममता बनर्जी एक खबर  रस्सी जल गई ,बल नहीं गए।  दो लाइनें मोमता के नाम : सामने दर्पण के, जब तुम आओगे , अपनी करनी पर ,बहुत पछताओगे।  का चला सिक्का तुम्हारे  नाम का , आज खुद को भी चला न पाओगे।  सपने जिनको आज तक बेचा किये , क्या पता था अदब को ही खाओगे।   अपभाषा में लगती हैं , राहुल की मौसी, कभी ये हिन्दू कभी  ये मुस्लिम टांग लिए टूटी फिरती है धौंसी।  ये पाकिस्तान ,रोहिंग्या सोच की चाची बेहद डरे हुए इंसान की भाषा बोल रही है ,हार चुकी है ये कथित घायल बाघिन ,छद्म रणचंडी।  हिन्दू वादी ममता बैकफुट पर ,चोटिल ममता फ्रंट फुट पर ,खेला होबे वील चेअर पर।  14 hours ago a day ago 18 hours ago a day ago 3 days ago a day ago a day ago a day ago 21 hours ago View all    

How to reach your purpose in life

                                                                 How to reach your purpose in life   HOW TO REACH YOUR PURPOSE IN LIFE                   (By: Dr.Deepti Goel, P.T) We all are aware that we are here for any purpose.Every soul has some purpose . But the question arises ,how we find out our purpose ?  Some people are able to find their purpose in life and some are not able to find or understand it.Those who find it ,can feel satisfaction in life and be able to get the way to success and those who are not able ,feel depressed , frustrated or defeated. But ,Again the question arises that those who got the way ,can be able to achieve that Success? So,the answer is which I believed that 'NO'.This is because everyone has different pot...

अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं। रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।

अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं। रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं। (ग़ज़ल निदा फ़ाज़ली साहब ) अंतरा -१ पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है, पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है, अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं ... अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम . हैं .. रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं। अंतरा -२ वक्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से. वक्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से. किसको मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं .. किसको मालूम कहा के है किधर के हम हैं ... रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं। अंतरा (३ ) चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब। चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब। सोचते रहते हैं किस रहगुज़र के हम है. सोचते रहते हैं किस रहगुज़र के हम है. रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं ... अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं। अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं। ...