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हमारी हवस का नतीजा है कोरोना एमरजेंसी

 हमारी हवा, पानी ,मिट्टी स्वस्थ हैं  तो हमारे तमाम पारितंत्र -पारिस्थितिकी और पर्यावरण जीवित हैं। हम अलहदा कहाँ हैं अपने पर्यावरण  और इकोलॉजी  से। प्रकृति ने कुदरती आवास हम सबको दिए हैं। दिक्कत यह है हम  आधुनिक कहे जाने वाले मानुष  एक के बाद एक आवासों को या तो अपनी हवस से उजाड़ रहें हैं या हवा पानी की तरह गंदला रहे हैं। समुंदरों को भी हमने कहाँ छोड़ा है। इसी हवस ने विषाणु जैसे निर्जीव और जीवित के बीच की कड़ी को , जीव -परा- आश्रित रोगकारकों  को घर से बे -घर कर दिया है।विष से बना है विषाणु शब्द।विषपाई शंकर चाहिए इनसे निपटने के लिए। आधुनिक मानव होमो -सैपियन इनके हाथों लगातार मारा जाता रहेगा।   मज़े से ये विषाणु और परजीवी एक होस्ट पर टिके हुए थे।कुदरती जंगलों में वर्षा वनों में।

 हम जंगली जानवरों को भी खाने लगे इग्जॉटिक फ़ूड के नाम पर। चमकादड़ और सर्पों को हम सूप बनाकर पीने  लगे।नतीजा एक के बाद एक विषाणुओं का जानवरों से मनुष्यों में अंतरण है।ज़ूनोटिक ट्रांसफर फ्रॉम एनिमल तो मैन  एक से बढ़कर एक घातक जानलेवा वायरस हमें डसने लगे हैं । कभी कोरोना परिवार के ,  सार्स(सीवीअर एक्यूट रिस्पायरेटरी सिंड्रोम )  और मर्स (मिडिल ईस्ट रिस्पायरेटरी सिंड्रम) बनकर कभी इबोला कभी स्वाइन फ्लू  और कभी एविएशन फ्लू बनकर ।

ठन गई है इन विषाणुओं की हमसे। संकट इनके सामने भी है सर्वाइवल का। कोरोना ने हमें सिखाया है : अब दुनिया को नष्ट करने के लिए तुम्हारा न्यूक्लिअर बटन नहीं हमारा कोरोना बटन चलेगा।

काश हमसे से कुछ तालिबानी कुछ तब्लीगी इसकी असलियत समझे होते। इनकी जेहाद को तमाम आईसिस के सिरफिरों को ,मसूद अज़हरों की सोच वालों को ये चेतवानी है तुम नहीं इस दुनिया का सफाया हम करेंगे कर सकते हैं।सम्भल जाओ वक्त रहते। जियो और जीने दो। 

ये इत्तेफाक नहीं है आज हमारा हवा पानी मिट्टी अपनी खोई हुई गुणवत्ता पुन :प्राप्त  करने लगें हैं। कोरोना लोकडाउन कोरोना आपातकाल है यह  ग्लोबल कोरोना   एमरजेंसी है। ग्रेटा थुनबर्ग की तरह चेता रहा है कोरोना। तब्लीगी सोच के लोग इसे समझने को तैयार नहीं हैं। अपनी मौत नहीं कोरोना के हाथों मारे जाएंगे सबके सब। कोरोना हिसाब मांगेगा क़यामत के दिन।
हमारी हवस का नतीजा है कोरोना एमरजेंसी  . 



(कोरोना वायरस विश्व स्वास्थ्य संगठन की नज़र से )

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